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डण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 [किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 एवं अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958]

800.00

PRODUCT DETAILS
EDITION:
FORMAT: PAPERBACK
ISBN: 978-93-92140-11-2
LANGUAGE: HINDI
PAGES:
PUBLISHER CODE: TBH/17
CATEGORY: TEXTBOOKS HINDI, CRIMINAL PROCEDURE, CRIMINAL LAW

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LANGUAGE: HINDI
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PUBLISHER CODE: TBH/17
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\\\"विधिशास्त्र\\\' (Jurisprudence) पर आधारित यह पुस्तक कानून के दर्शन का एक व्यापक और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रदान करती है, जो ऐतिहासिक और आधुनिक संदर्भों में इसकी प्रकृति, स्रोतों और कार्यों की खोज करती है। सिद्धांत और व्यावहारिक अंतर्दृष्टि के बीच संतुलन बनाने के लिए संरचित यह पुस्तक छात्रों, अभ्यर्थियों और पेशेवरों के लिए डिज़ाइन की गई है जो कानूनी प्रणालियों और विचारधारा की नींव पर स्पष्टता चाहते हैं।

मुख्य बिंदु और विषय-वस्तु:
परिचय और विकास: यह पाठ विधिशास्त्र के अर्थ, प्रकृति और कार्यक्षेत्र के परिचय से शुरू होता है, जिसमें कानून, नैतिकता और न्याय के साथ इसके संबंधों को संबोधित किया गया है। यह कानूनी विचारधारा के ऐतिहासिक विकास को रेखांकित करता है, जिसमें रोमन कानून, मध्यकालीन सिद्धांतों और आधुनिक कानूनी दर्शन के विकास के योगदान पर प्रकाश डाला गया है।

विधिशास्त्र के विभिन्न मत (Schools of Jurisprudence): पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विधिशास्त्र के विभिन्न मतों का परीक्षण करता है। इसमें विश्लेषणात्मक (Analytical), ऐतिहासिक, दार्शनिक और समाजशास्त्रीय मतों के साथ-साथ मार्क्सवादी और यथार्थवादी (Realist) दृष्टिकोणों की व्याख्या की गई है। प्राकृतिक कानून (Natural Law) के सिद्धांतों का शास्त्रीय से लेकर समकालीन रूपों तक का विवरण, कानून और नैतिकता के बीच स्थायी तनाव को रेखांकित करता है।

कानून के स्रोत और कानूनी अवधारणाएं: पुस्तक कानून के स्रोतों, जैसे कि विधान (Legislation), नजीर (Precedent) और रूढ़ि (Custom) का गहराई से अध्ययन करती है। अधिकार (Rights), कर्तव्य (Duties), स्वामित्व (Ownership), कब्जा (Possession), दायित्व (Liability) और विधिक व्यक्तित्व (Personality) जैसी अवधारणाओं पर विस्तृत चर्चा की गई है, जिसे सैद्धांतिक विश्लेषण और अदालती संदर्भों का समर्थन प्राप्त है।

न्याय और संप्रभुता: इसमें न्याय और कानूनी सिद्धांतों पर ध्यान दिया गया है, जिसमें वितरणात्मक (Distributive) और सुधारात्मक न्याय, साम्या (Equity) की भूमिका और रॉल्स (Rawls) जैसे विचारकों द्वारा प्रतिपादित न्याय के आधुनिक सिद्धांतों की व्याख्या की गई है। पुस्तक संप्रभुता की प्रकृति, कानूनी प्रतिबंधों (Sanctions) और व्यवस्था बनाए रखने, विवादों को सुलझाने और सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने में कानून के कार्यों को भी संबोधित करती है।

समकालीन विकास: विधिशास्त्र में समकालीन विकास, जैसे मानवाधिकार विमर्श का उदय, कानून का वैश्वीकरण, और \\\'क्रिटिकल लीगल स्टडीज\\\' तथा \\\'नारीवादी विधिशास्त्र\\\' (Feminist Jurisprudence) के बढ़ते प्रभाव पर भी विचार किया गया है।

निष्कर्ष:
एक स्पष्ट और व्यवस्थित शैली में लिखी गई यह पुस्तक शास्त्रीय सिद्धांतों को आधुनिक दृष्टिकोणों के साथ एकीकृत करती है। ऐतिहासिक नींव को वर्तमान प्रासंगिकता के साथ जोड़कर, यह विधिशास्त्र अकादमिक अध्ययन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और कानून के दर्शन के साथ गहरे जुड़ाव के लिए एक अनिवार्य संसाधन है।\\\"
यह व्यापक पुस्तक कानून के नए प्रावधानों की स्पष्ट और विस्तृत व्याख्या प्रदान करती है, जिससे इसकी विशेषताओं की संपूर्ण समझ सुनिश्चित होती है। इसमें प्रासंगिक निर्णयज विधि (केस लॉ) के क्रॉस-रेफरेंस शामिल हैं, जो इसकी शैक्षणिक और व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं।

इस पुस्तक की एक मुख्य विशेषता इसकी दो विशिष्ट तुलनात्मक तालिकाएं (Comparative Tables) हैं: एक तालिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराओं का दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के साथ मिलान करती है, और दूसरी तालिका इसके विपरीत तुलना प्रदान करती है।

एक सरल और सुबोध शैली में लिखी गई यह पुस्तक छात्रों, न्यायिक अभ्यर्थियों, कानूनी पेशेवरों और भारत की विकसित होती आपराधिक न्याय प्रणाली को समझने के इच्छुक किसी भी व्यक्ति के लिए एक अमूल्य संसाधन है। यह शैक्षणिक अध्ययन, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और व्यावसायिक संदर्भ के लिए आदर्श है।\\\"
यह पुस्तक तीन भागों में विभाजित है:

भाग I: इसमें विशिष्ट संविदाओं (specific contracts) जैसे कि क्षतिपूर्ति (indemnity), उपनिधान (bailment), गिरवी (pledge) और एजेंसी पर चर्चा की गई है।

भाग II: वस्तु विक्रय अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या करता है, जिसमें स्वामित्व, संपत्ति का हस्तांतरण, शर्तें (conditions), वारंटी और अनुबंध के उल्लंघन के लिए उपचार शामिल हैं।

भाग III: भारतीय भागीदारी अधिनियम पर चर्चा करता है, जिसमें भागीदारी का गठन, भागीदारों के अधिकार और कर्तव्य, विघटन (dissolution) और पंजीकरण को कवर किया गया है।

एक स्पष्ट और व्यवस्थित शैली में लिखी गई यह पुस्तक विधायी प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयज विधि (केस लॉ) के साथ मिश्रित करती है, जिससे पाठकों के लिए यह समझना आसान हो जाता है कि कानूनी सिद्धांतों को व्यवहार में कैसे लागू किया जाता है।

यह पुस्तक कानून के छात्रों, शिक्षकों और पेशेवरों के साथ-साथ वाणिज्य, व्यवसाय प्रबंधन और कॉर्पोरेट क्षेत्र के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने का लक्ष्य रखती है।\\\"
यह संस्करण बैंक गारंटी, प्रतिभूति (suretyship), उपनिधान (bailment) और भागीदारी की कानूनी स्थिति पर हाल के न्यायिक निर्णयों को शामिल करने के लिए पूरी तरह से संशोधित और अद्यतन किया गया है, जो पुस्तक को वर्तमान कानूनी विकास के लिए अत्यधिक प्रासंगिक बनाता है।

एक सरल और व्यवस्थित तरीके से लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को जटिल कानूनी प्रावधानों को आसानी से समझने में मदद करने के लिए डिज़ाइन की गई है। यह विशेष रूप से L.L.B., L.L.M., वाणिज्य, व्यवसाय प्रशासन और प्रबंधन के छात्रों के साथ-साथ न्यायिक सेवाओं, सिविल सेवाओं और बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए उपयोगी है।\\\"

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